इक्कु ओअंकारु सतिगुर प्रसादि ॥
श्री वाहिगुरू जी की फते ॥
तनखाहनामा पातिसाही १० ॥
प्रसनु कीआ भाई नंद लाल जी का ॥ वाक गुरू गोबिंद सिंह जी के ॥
दोहरा ॥
प्रसनु कीआ नंद लाल जी गुरू बताईऐ मोहि ॥ कवनु करमु इन जोग हौ कवनु करमु नाही सोइ ॥१॥
गुरूवाच ॥
दोहरा ॥
नंद लाल ए बचन सुनि सिख करम है एहि ॥ नाम दान इसनानु बिनु करै ना इन बिनु नेहि ॥२॥
चौपई ॥
प्रात काल सतसंग न जावै ॥ तनखाहदारु वहु बडा कहावै ॥ सतसंग जाइ कै चितु डुलावै ॥ ईहां ऊहां ठउर न पावै ॥ हरिजसु सुनते बात चलावै ॥ कहै गोबिंद सिंह वहु जम पुर जावै ॥ नृधन देख देख न पासि बैठावै ॥ ओहु तनखाही मूल कहावै ॥ सबद गिआन बिनु करै जो बात ॥ ता के कछू न आवै हाथ ॥ भोग सबद निवावै सीस ॥ ता को मिलै परम जगदीस ॥३॥
दोहरा ॥
जो प्रसादि को बाटई मनमै धरे जो लोभु ॥ किसै थोड़ा किसै अगला सदा रहै तिसु सोगु ॥४॥
चौपई ॥
कड़ाह बणाण की बिधि सुनि लीजै ॥ तीन भाव को समसर कीजै ॥ लीप न आगै बहुकर दीजै ॥ माजन करि भाजन धोवीजै ॥ करि इसनानु पवित्र होइ बहै ॥ वाहिगुरू बिनु मुखि अवरु न कहै ॥ नवतन कुंभ पूरि कारि लेहि ॥ गोबिंद सिंह सभी फल तिस को देहि ॥ करि तिआर चौकी प्र धरै ॥ चार ओर बहि कीर्तन करै ॥ सुनो नंद लाल बात हैइ हरे ॥ जिस पर अपनी कृपा करे ॥५॥
दोहरा ॥
मु हर तुरक की सिर पर धरे लोह लगावै चरण ॥ कहै गोबिंद सिंह सुनि नंद लाल जी फिरि फिरि होइ तिसु मरण ॥६॥
चौपई ॥
लगे दीबान सुनि मूल न जावै ॥ रहित बिना प्रसादि वरतावै ॥ सूहा पहर करे नसवार ॥ कहै गोबदिं सिंह जम करै खुआर ॥ माई भैण जो आवै संगति ॥ द्रिसटि बुरी देखै तिसु पंगति ॥ सिख होइ मनि करै क्रोध ॥ कं निआ मूल न देवै सोध ॥
धी भैण का पैसा खाइ ॥ कहै गोबिंद सिंह धके जम खाइ ॥ सिख होए बिनु लोह जो फिरै ॥ माल अथिति का बलु करि छलै ॥ तुरकु देखि सिर ते हाथ धरै ॥ ओरु तनखाही अधिर नरै ॥७॥
सोरठा ॥
कंघा दोनो वखत कर पागु चुने बिनु कर बांधई ॥ दातणु नीत करै ना दुख पावै नंद लाल जी ॥८॥
दोहरा ॥
दसवंध गुरू न देवई झूठ बोल जो खाइ ॥ कहै गोबिंद सिंह सुनि नंद लाल जी तिस का कछ न बिसाह ॥९॥
चौपई ॥
ठंडे पाणी जो नही नावै ॥ बिनु जपु पढ़े प्रसादि जो खावै ॥ बिनु रहिरास सिसंधिआ जो खोवै ॥ बिनु कीर्तन रैण जो सोवै ॥ चुगली कर काजु बिगारै ॥ ध्रिग तिसु जनमु जो धरम बिसारै ॥ करै बचन जो पालै नाही ॥ कहै गोबिंद सिंह ठउर तिसु नाही ॥ लै तुरक ते मास जो खावै ॥ बिनु गुर बचन गीत जो गावै ॥ त्रिआ सबदि सुनै चितु लाइ ॥ नंद लाल सुनो ओहु जम पुर जाइ ॥१०॥
दोहरा ॥
साध कहावै रहित बिनु अरु चीनै नाही रूप ॥ कपट करन ते नंद लाल जी भली बनै तिसु चूपि ॥११॥
चौपई ॥
बिनु अरदास जो काज सिधावै ॥ भेट कीए बिनु मुखि कछु पावै ॥ तिआगी वस्तु जो गहन करे ॥ बिनु त्रिआ आपनी सेज जो रमे ॥ अथिति देखि जो देवै न दान ॥ ओहु नही पावै दरगह मान ॥ कीर्तन कथा सो मनि नही लावै ॥ साध सिख को बुरा अलावै ॥ निंदा जूआ खेल हरै जो माल ॥ महा दुख पावै नंद लाल तिसु को काल ॥
गुर की निंदा सुनै न कान ॥ भेटन करै संगि कृपान ॥ गोलक राखै नाहि जो छल का करै व्यापार ॥ कहै गोबिंद सिंह सुनो नंद लाल जी ओहु भोगे नरकि हजार ॥१२॥
चौपई ॥
फूक मार दीपक बिज मावै ॥ जूूठे पाणी अगनि बुझावै ॥ वाहिगुरू कहै बिनु प्रसादि मुखि पावै ॥ वे सवा दुआरै सिख जो जावै ॥ पर इसत्री सौ नेहु लगावै ॥ कहै गोबिंद सिंह ओहु सिख नही भावै ॥ गुर तलपी कपटी हो जोइ ॥ बड तनखाही जानु हु सोइ ॥ गुर को छाडि अवर को मांगै ॥ रैण सोइ तेड़ होइ नांगै ॥ नगन होइ भोग जो करै ॥ नगन होइ जल मजनु करै ॥१३॥
दोहरा ॥
नगन करै फैल बद होइ नगन सीस जो खाइ ॥ नगन प्रसादि जो बाटई तनखाही बडो सदाइ ॥१४॥
चौपई ॥
खालसा सोई जो निंदा तिआगै ॥ खालसा सोई जो लड़ै होइ आगै ॥ खालसा सोइ जो पंचा को मारै ॥ खालसा सोई जो करमा के साड़ै ॥ खालसा सोई जो देवै दान ॥ खालसा सोई जो मारै खान ॥ खालसा सोई जो पान को तिआगै ॥ खालसा सोई जो अनादि नु जागै ॥ खालसा सोई जो गुरबाणी हितु लावै ॥ खालसा सोई जो मुहे मुहि खावै ॥१५॥
दोहरा ॥
खलक खालक की जाण कै खलक दुखावै नाहि ॥ खलक दुखै जब नंद लाल जी खालक रपे भाहि ॥१६॥
चौपई ॥
खालसा सोई जो नृधन को पालै ॥ खालसा सोई जो दुस्ट को गालै ॥ खालसा सोइ जो नामु जपु करै ॥ खालसा सोई जो मुखालस पर चड़ै ॥ खालसा सोई जो बंधन को तोड़ै ॥ खालसा सोई जो मनु नामु सौ जोड़ै ॥ खालसा सोई जो चड़ै तुरंग ॥ खालसा सोई जो करै नित जंग ॥ खालसा सोई जो सस्त्र को धारै ॥ खालसा सोई जो तुरका को मारै ॥ खालसा सोई जो धरम को पालै ॥ खालसा सोइ जो सीस छत्र दे नालै ॥१७॥
दोहरा ॥
दोही फिरै अकाल की निंदा कर सकै न कोइ ॥ बन परबत सभि भजैगे तरै जगत महि सोइ ॥१८॥
चौपई ॥
सुनो नंद लाल इहु साजु ॥ प्रगटु करौगा आपना राजु ॥ चार बरन कौ इक रंग कराऊ ॥ वाहिगुरू का जापु जपाऊ ॥ चड़ै तुरंग उड़ावै बाज ॥ तुरक देख कै जावैगे भाज ॥ सवा लाख सौ एक लड़ाऊ ॥ चले सिंह तिसु मुक्ति कराऊ ॥
झूलन नेजे हस्ती साजे ॥ दुआरि दुआरि पर नौबत बाजै ॥ सवा लाख जब धुखे पलीता ॥ तबै खालसा उदे अस्त लौ जीता ॥१९॥
दोहरा ॥
राज करेगा खालसा आकी रहै न कोइ ॥ खुआर होइ सभ मिलैगी बचे सरनि जो होइ ॥
बचन है श्री गुरू जी का कि जो कोई सिख का बेटा होए अरु मोना होइ जावै ॥ तिस की जड़ सूकी और जो मोना सिख होइ जावे तिस की जड़ हरी ॥ इत श्री तनखाहनामा संपूर्णं पढ़ै सुनै मोख मुक्त पावै ॥२०॥
इक्कु ओअंकारु सतिगुर प्रसादि ॥
अथ रहितनामह लिख्यते ॥
श्री गुरू वाच ॥
गुरसिख रहित सुनहु मेरे मीत ॥ उठि प्रभात करे हित चीत ॥ वाहिगुरू पुन मंत्र सु जापु ॥ करि इसनान पढ़े जपु जापु ॥१॥ दरसन करे मेरा पुन आइ ॥
अदब सिउं बैठ रहहि चित लाइ ॥ तीन पहिर जब बीते जान ॥ कथा सुने गुर हित चित ठान ॥२॥ संधिआ समें सुने रहिरास ॥ कीर्तन कथा सुने हरि जास ॥ इन पै नेम जु एक कराइ ॥ सो सिख अमरपुरी महि जाइ ॥३॥ पांच नेम कर सिख जु धारहि ॥ इकीस कुल कुटुंब कउ तारहि ॥ तारे कुटुंब मुक्ति सो होइ ॥ जनम मरन नहि पावहि सोइ ॥४॥
नंद लाल उवाच ॥
तुम जु कहा गुरदेव जी दरसन करि मुहि आइ ॥ लखीए तुमरा दरस कहां कहहुं मोहि समझाइ ॥५॥
श्री गुरू वाच ॥
तीन रूप हैं मोह के सुनहु नंद चित लाइ ॥ निरगुण सरगुण गुरसबद कहहुं तोहि समझाइ ॥६॥
चौपई ॥
एक रूप तिहुं गुण ते परे ॥ नेति नेति जिह निगम उचरे ॥ घटि घटि व्यापक अंतरजामी ॥ पूरि रहयों जिउं जल घट भानी ॥७॥ दूसर रूप ग्रंथ जी जानहु ॥ आपन अंग मेरे कर मानहु ॥ रोम रोम अच्छर सो लहूं ॥ बात जथारथ तुम सों सत कहहुं ॥८॥ जो सिख गुर दरसन की चाहि ॥ दरसन करे ग्रंथ जी आहि ॥ प्रभात समय करके इसनान ॥ तीन प्रदछना करे सुजान ॥९॥ सबद सुने गुर हित चित लाइ ॥ गिआन सबद गुर सुने सुनाइ ॥ जो मम साथ चहे करि बात ॥ ग्रंथ जी पढ़े बिचारहि साथ ॥१०॥ जो मुझ बचन सुनन की चाइ ॥ ग्रंथ विचार सुनहु चित लाइ ॥ मेरा रूप ग्रंथ जी जान ॥ इस में भेद न रंचक मान ॥११॥ तीसर रूप सिख है मोर ॥ गुरबाणी रति जिह निस भोर ॥ विसाहु प्रीति गुरसबद जु धरे ॥ गुर का दरसन नित उठ करे ॥१२॥ गिआन सबद गुर सुने सुनाइ ॥ जपुजी जापु पढ़े चित लाइ ॥ परदारा का तिआग जो करहि ॥१३॥ गुरसिख सेव करे चित लाइ ॥ आपा मन का सगल मिटाइ ॥ इन करमन महि जो परधान ॥ सो सिख मेरा रूप पहिचान ॥१४॥
दोहरा ॥
ऐसे गुरसिख मान है सेवा करे जो कोइ ॥ तन मन धन पुंन अरप कै सो मुझ सेवा होइ ॥१५॥ ऐसे गुरसिख सेव की मोहि पहुंचै आइ ॥ सुनहु नंद चित देइ करि मुक्ति बैकुंठै पाइ ॥१६॥
नंद लाल उवाच ॥
निरगुण सरगुण गुरसबद कहे रूप तुम तीन ॥ निरगुण रूप नहीं देखीए सरगुण सिख अधीन ॥१७॥
चौपई ॥
तुमरा निरगुण रूप अपारा ॥ सो किम देखैं दीन दयारा ॥ जगत रूप तुम कहहुं सुआमी ॥ घटि घटि वासी अंतरजामी ॥१८॥
श्री गुरू वाच ॥
सुनहु सिख भाई नंद लाल ॥ तुमहि हमारे बचन रसाल ॥ गुरमुख सरगुण रूप सुजान ॥ प्रिथम सेव गुर हित चित कान ॥१९॥ गुरसिख सेव सबद जो गहहुं ॥ सबद सरूप सो इह बिधि लहहुं ॥ सबद सरूप वाक जो धारे ॥ तिस ते लखीए अपर अपारे ॥२०॥ ते मैं गोस्टि कही सो भाई ॥ पढ़े सुने जो मन चित लाई ॥ तिस की महिमा कहहुं बखान ॥ जोती जोत मिले मोहि आन ॥२१॥ संमत सत्रह सहस सु बावन ॥ मघर नौमी सुख दावन ॥ सुरगुर वाह सतद्रू तीर ॥ बचन कहे नंद लाल सु वीर ॥२२॥
दोहरा ॥
वाहिगुरू गुर जापई वाहिगुरू करि ध्यान ॥ मुक्ति लाभ सो होइ है गुरसिख रिदि महि मान ॥ इत श्री रहितनामह संपूर्णं ॥२३॥ रहितनामा भाई प्रह्लाद सिंह
हुकम होआ श्री मुख वाक पातिसाही १० ॥
लाल दरियाई के प्रथाइ ॥
दोहरा ॥
अबचल नगर बैठे गुरू मन महि कीआ बीचार ॥ बोलिआ पूरा सतिगुरू करि नमसकार करतार ॥ हुकम होया प्रह्लाद सिंह बिप्र जात हंसराइ ॥ निकट बुलाया गुरू जी लीनउ कंठ लगाइ ॥ पंथ चलयो है जगत मैं गुर नानक प्रसादि ॥
रहित बताईए खालसे सुन भाई प्रह्लाद ॥१॥
चौपई ॥
होइ सिख सिर टोपी धरै ॥ सात जनम कुष्टी हुइ मरै ॥ जो सिख गल महि तागा मेलै ॥ चौपड़ बाजी गनिका खेलै ॥ जनम सुआन पावैगा कोटि ॥ बीजयो हाथ बुरा इस खोट ॥२॥ पाग उतारि प्रसादि जो खावै ॥ सो सिख कुंभी नरक सिधावै ॥३॥
दोहरा ॥
मीणा और मसंदिआ मोना कुड़ी जो मार ॥ होइ सिख वरतन करहि अंत करेगा खुआर ॥४॥ वाहिगुरू के मंत्र बिन जपै अउर कोई जाप ॥ सो साकत सिख मूल नहि बाचत श्री मुख आप ॥ मेरउ हुकम मानहि नहीं करहि न सिख की सेव ॥ सो बीरज मलेछ को प्रगट पछानहु भेव ॥५॥
चौपई ॥
हुकम देखि कार नहीं राखै ॥ गोलक गोप मिथिआ मुख भाखै ॥ कार भेट सुख मंनत चुरावै ॥ ऐसा सिख गुरू नहि भावै ॥६॥ तूट परिओ माइआ की फासी ॥ भ्रमता फिरै लाख चउरासी ॥ सो बीरज मलेछ को जान ॥ सुण भाई प्रह्लाद सुजान ॥ गुरू खालसे आदि लों जो पालै जग मोह ॥ सो साकत नरकी सदा इन से करै जो ध्रोह ॥७॥ सूहे अंबर पहिन कर जो नासे नसवार ॥ लगे ताड़ना सीस पर सुनीए नरक मंझार ॥८॥ बिना जपु जापु जपे जो जोवहि प्रसादि ॥ सो बिसटा का किरम हुइ जनम गवावै बाद ॥९॥
चौपई ॥
प्राता काल गुर गीत न गावै ॥ रहिरास बिना प्रसादि जो खावै ॥ बाहरमुखी सिख तिसु जानो ॥ सभ मिथिआ तिस मानो ॥ लख चउरासी भ्रमता फिरै ॥ बार बार जग जनमै मरै ॥ गुरू बचन सिउ तुटा जाइ ॥ दरगहि तांकउ मिलै सजाइ ॥१०॥
दोहरा ॥
अकाल पुरख कउ छाड करि भजै देव कोई अउर ॥ जनम जनम भ्रमता फिरहि लहहि न सुख की ठउर ॥ पाहन की पूजा करै सिख न निवावहि सीस ॥ सो साकत निगुरा सदा मारिआ श्री जगदीस ॥ करी थापना जास की मोह जु अपने हाथि ॥ तिस की समसर जो करै जर जावहि कुल साथि ॥ कार भेट सुख मंनत कर जो सिख चित भ्रमाइ ॥ सो साकत पापी सदा बिकट रूप होइ जाइ ॥११॥ कुड़ीमार मसंद जो मीणे का प्रसादि ॥ लए जु इन के हाथ का जनम गवावहि बाद ॥ छाड सिखन के चरण कउ लए पंथ जो अउर ॥ ऐथहि ओथहि दुख लहै गुर सिखन को चोर ॥१२॥
चौपई ॥
मड़ी गोर देवल जो मानै ॥ परपंथन को ऊच बखानै ॥ सो साकत गुर का सिख नाही ॥ फासि परयो जम कंकर पाही ॥१३॥ टोपी देखि निवावहि सीस ॥
सो सिख नरकी बिसवै बीस ॥१४॥ अकाल पुरख की सेवा करै ॥ सो सिख बंस सगल ले तरै ॥१५॥
दोहरा ॥
गुरू खालसा मानीअहि परगट गुरू की देह ॥ जो सिख मो मिलबे चहहि खोज इनहु महि लेहु ॥१६॥ कान कटे अर तुरक का करै न मूल विसाहु ॥ जो सिख सों हित न करहि सो नरके परि जाहु ॥१७॥ सतिगुर की बाणी बिना रसना रटहि जो होर ॥ सो मारिआ करतार का पड़ा नरक मध घोर ॥१८॥
चौपई ॥
छे दरसन की जो मत धारै ॥ कुल संबूह लै नरक सिधारै ॥ बाझहु गुर सिखन करे सेवा ॥ मिथिआ मानो सुर नर देवा ॥१९॥ अकाल पुरख की मूरत एह ॥ परगट अकाल खालसा देव ॥ यामें रंच मिथिआ नहि भाखी ॥ गुर नानक गुर अंगद साखी ॥२०॥
दोहरा ॥
लैणा देणा खालसे आन देव सभ झूठ ॥ अउर देव इव मानीए जिउं बारू की मूठ ॥ अकाल पुरख के बचन सिउं परगट चलायो पंथ ॥ सभ सिखन को बचन है गुरू मानीअहु ग्रंथ ॥२१॥ थाप चलयो जो जगत मैं तिनहि निवावउ माथ ॥ वाहिगुरू के मंत्र बिन मिथिआ सारी गाथ ॥२२॥ सिख कउ सिख जउ अमृत दीना ॥ कोटि असुमेध जग फल कीना ॥ जो गुर की बाणी सिख गावै ॥
जीवन मुक्त पदारथ पावै ॥ चापी करो मलहि सिख चरना ॥ तिस सिख को मैं लीनो सरना ॥२३॥ करि प्रसादि सिख मुख पावै ॥ तिस सिख पै गुर वारने जावै ॥ रहिरास समे गुरू हुकम को पढहि प्रीत सत भाउ ॥ प्रेम सहित रसना रटहि ॥
प्रगट मिलहि मुहि आउ ॥ बचन प्रतीत रखहि सिख जोई ॥ तैसो ही फल प्राप्त होई ॥ गुर का बचन गुरू की मूरत ॥ भुगत मुक्ति वर साचो पूरत ॥ रहिणी रहहि सोई सिख मेरा ॥ वह ठाकुर मैं उस का चेरा ॥ करहि अकाल पुरख की आसा ॥ जनम मरण कट डारै फासा ॥२४॥ सति अकाल श्री वाहिगुरू धरम बीज यह मंत्र ॥
सरब जाप कउ जापु इह कहिओ आदि अर अंत ॥२५॥ संबत सत्रह सै भए बरख बवंजा निहार ॥ माघ वदी थिति पंचमी रविवार सुभ वार ॥२६॥ ॥१॥
चौपई ॥
कछ केस कंघा किरपान ॥ कड़ा और जो करो बखान ॥ एह कके पंज तुम मानो ॥ गुरू ग्रंथ को तुम सभ जानो ॥ गुरमुख सिंह आगिआ मुहि दीनी ॥ रहितनामा तुम लिखो नवीनी ॥ इति श्री रहितमाना श्री गुरू कलगीधर गुरू गोबिंद सिंह जी भाई प्रह्लाद सिंह प्रति ॥ संपूर्णं ॥२७॥२॥